हरियाणाराज्य

खेती में नया प्रयोग: कुरुक्षेत्र के किसान ने बदली भारतीय सब्ज़ी खेती की दिशा

कुरुक्षेत्र : खेती में अब नए-नए प्रयोग करके खेती को मुनाफे का सौदा बनाया जा रहा है लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि आज से करीब 23 साल पहले खेती में किसानों को कुछ नया मिल सकता था। उस समय किसानों को कृषि यंत्रों और नई तकनीक का बहुत अभाव था, लेकिन उस समय भी एक किसान ने खेती में कुछ ऐसे करके दिखाया जो सैकड़ो हजारों किसानों के लिए प्रेरणा बना और उनको एक नई खेती की तरफ लेकर गया। कुरुक्षेत्र के गौरीपुर गांव के किसान बिनवंत सिंह की कहानी एक ऐसी ही कहानी है जिसने  “आइसबर्ग लेट्यूस” खेती करके भारत के किसानों को एक नई खेती से अवगत कराया।

2003 में 18 लाख सालाना पैकेज की नौकरी छोड़ शुरू की खेती
किसान बिनवंत सिंह ने बताया कि उन्होंने अपनी पढ़ाई लिखाई पूरी करने के बाद महाराष्ट में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई थी वहां पर उनको अच्छा पैकेज भी मिला हुआ था । लेकिन गांव में अपनी पुश्तैनी जमीन पर कुछ करने का एक जुनून उनके अंदर था उन्होंने इस जुनून के चलते एक अच्छी पैकेज की नौकरी जिसमें उनको 18 लाख रुपए सालाना पैकेज मिल रहा था। उसको छोड़कर अपने गांव चले आए और यहां पर पुश्तैनी जमीन पर खेती करने शुरू की।

नौकरी छोड़ने पर पिता हुए नाराज 
उन्होंने बताया कि जब वह इतने अच्छे पैकेज वाली नौकरी छोड़कर अपने घर वापस लौट आए तब उनके पिता काफी नाराज हुए क्योंकि उनके पिता ने उनको बड़े अरमानों के साथ पढ़ाया लिखाया और नौकरी करने लायक बनाया लेकिन बेटा इतने अच्छे पैकेज की नौकरी छोड़कर वापस घर चला आया क्योंकि उस समय में 18 लाख रुपए सालाना पैकेज एक बहुत ही अच्छा पैकेज माना जाता था। लेकिन उन्होंने  खेती के लिए उसको छोड़ दिया जिसे उनके पिता नाराज हुए उन्होंने कहा कि हम लोग भी अपनी कई पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं खेती में कुछ नहीं बचता इसलिए तुम नौकरी करो लेकिन उन्होंने अपने पिता की बात नहीं मानी और खेती करने की ठान ली।

शुरू की आइसबर्ग लेट्यूस की खेती
उन्होंने बताया की शुरुआत में उन्होंने भी परंपरागत खेती को शुरू किया था लेकिन उसमें कुछ बचा नहीं है फिर कुछ अलग करने की सोची। उन दिनों मैकडॉनल्ड’ कंपनी भारत में आई थी। उनको अपने फूड प्रॉडक्ट्स के लिए आइसबर्ग लेट्यूस चाहिए थे जिसके चलते उन्होंने उनसे संपर्क किया और उन्होंने कहा कि अगर वह उनके नॉर्म्स के अकॉर्डिंग अच्छी क्वालिटी के आइसबर्ग लेट्यूस उनको तैयार करके दे सकते हैं तो उस पर वह जरूर काम करें। लेकिन दो-तीन साल तक उसका हिसाब नहीं आया क्योंकि उस खेती की जानकारी उनको नहीं थी कि इसकी खेती कैसे करनी है इनको ही नहीं भारत में बहुत की कम लोग उसके बारे में जानते होंगे । जिसके चलते शुरुआत में उनको इस खेती के लिए काफी परेशानी हुई।

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