उत्तर प्रदेशराज्य

धोखाधड़ी से पाई गई अवैध नियुक्ति को लंबे समय की सेवा भी वैध नहीं बना सकती

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज़ के आधार पर नौकरी हासिल करता है तो ऐसी नियुक्ति शुरुआत से ही शून्य मानी जाएगी। भले ही उसने कितनी भी लंबी सेवा पूरी कर ली हो। कोर्ट ने शिक्षा विभाग में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लगभग साढ़े तीन दशक तक सहायक शिक्षक के रूप में सेवा देने वाली एक महिला की याचिका को खारिज कर दिया है। वीणा मेनन की याचिका खारिज़ करते हुए न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने यह टिप्पणी की।

याची को 1989 में मेरठ के एक जूनियर हाई स्कूल में सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्त किया गया था। विवाद तब शुरू हुआ जब मानव संपदा पोर्टल पर शैक्षिक दस्तावेज अपलोड करने की अनिवार्यता आई। याची ने वर्ष 1984 की अपनी हाईस्कूल की मार्कशीट और प्रमाण पत्र जारी करने के लिए माध्यमिक शिक्षा परिषद में आवेदन किया, जो किन्हीं कारणों से दशकों से ‘विदहेल्ड’ (रोका गया) श्रेणी में था।

जांच के दौरान यह खुलासा हुआ कि याची ने हाईस्कूल परीक्षा में बैठने के लिए कक्षा 8 का जो स्थानांतरण प्रमाणपत्र (टीसी) प्रस्तुत किया था, वह फर्जी था। इतना ही नहीं, इंटरमीडिएट की परीक्षा में प्रवेश पाने के लिए भी उसने कक्षा 11वीं की फर्जी टीसी का सहारा लिया था। संबंधित स्कूल के प्रधानाचार्य ने भी पुष्टि की कि याची को कभी कोई हस्तलिखित मार्कशीट जारी नहीं की गई थी और उसका परीक्षा परिणाम परिषद के रिकॉर्ड में कभी घोषित ही नहीं हुआ था।

याची की ओर से तर्क दिया गया था कि उसने 35 वर्षों तक संतोषजनक सेवा की है और इस स्तर पर उसकी योग्यता पर सवाल उठाना नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। कोर्ट ने ने इन दलीलों को सिरे से नकारते हुए कहा कि धोखाधड़ी और न्याय कभी साथ नहीं रह सकते। कोर्ट ने कहा कि जब नियुक्ति की नींव ही फर्जी दस्तावेजों पर टिकी हो, तो पूरी सेवा अवधि अवैध हो जाती है।

अदालत ने माध्यमिक शिक्षा परिषद और बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा याची का वेतन रोकने और उसके दस्तावेजों को रद्द करने की कार्यवाही को पूरी तरह वैध ठहराया। कोर्ट ने कहा किया कि अनुच्छेद 226 के तहत मिलने वाला असाधारण अधिकार क्षेत्र उन लोगों के लिए नहीं है जो खुद धोखाधड़ी में लिप्त रहे हों। इस प्रकार, याचिका को मेरिट के आधार पर पूरी तरह से निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।

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